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Sunday, 12 April 2020

*प्रकृति को समर्पित एक गीत...*

*विधा:- लावणी छंद*

रंग-बिरंगे पुष्प खिले हैं, आज प्रकृति के उपवन में।
शीतल मंद समीर प्रवाहित, हर्ष भरे मन आँगन में।

मंजरियों की मादक खुशबू, मन मतवाला करती है।
तरुओं में पल्लव आने से, अनुपम छटा बिखरती है।
मस्त मगन भँवरे भी गुंजन, करते नित-प्रति कुंजन में।
रंग-बिरंगे पुष्प खिले हैं, आज प्रकृति के उपवन में।1

रंगों का मौसम फिर आया, बाल-वृद्ध हिय हुलस उठे।
प्रमुदित चित्त कराये मौसम, सबके तनमन विहँस उठे।
रँग जायेंगे रँग में फिर से, आस जगी यह जन-जन में।
रंग-बिरंगे पुष्प खिले हैं, आज प्रकृति के उपवन में।2

ढोल मंजीरों की थापों पर, फाग सभी मिल गायेंगे।
झूमें नाचें पूर्ण मगन हो, सबके मन हर्षायेंगे।
भर उमंग में हुए तरंगित, लहर उठेगी तन-मन में।
रंग-बिरंगे पुष्प खिले हैं, आज प्रकृति के उपवन में।3

करे प्रतीक्षा हर प्रेमी अब, रंगों के बादल छाएं।
मधुमासी सुरभित बयार में, प्रेम कोंपलें उग आएं।
प्रणयबद्ध होने को आतुर, प्रीत निखरती यौवन में।
रंग-बिरंगे पुष्प खिले हैं, आज प्रकृति के उपवन में।4

रंगीला बासंती मौसम,स्वर्ग बनाये निर्जन में।
रंग-बिरंगे पुष्प खिले हैं, आज प्रकृति के उपवन में।

*प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, 29/30 जनवरी  2020*

Saturday, 11 April 2020

सरस्वती वंदना


हे वीणावादिनी तुझको नमन संसार करता है।
लगाता ध्यान जो तुझ में वही जीवन सँवरता है।
हे वीणावादिनी तुझको नमन संसार करता है...

विराजें हंस पर देवी धवल से वस्त्र हैं तन पर।
बजा कर वह मधुर वीणा करें सुमधुर असर मन पर।
जिसे वरदान देती हैं वही दिन दिन निखरता है।1
हे वीणावादिनी तुझको नमन संसार करता है...

मैं हूं मतिमंद हे माते मुझे दो बुद्धि की थाती।
भरूं घृत ज्ञान दीपक में जलाऊं भक्ति की बाती।
तुम्हारा नाम ही उर में भगति का भाव भरता है।2
हे वीणावादिनी तुझको नमन संसार करता है...

करूं माता यही विनती उड़ेलो ज्ञान का सागर।
मिले विद्द्या जरा भर जाय हमारी बुद्धि की गागर।
जो पाता है दरश तेरे वही भव से उतरता है।3
हे वीणावादिनी तुझको नमन संसार करता है...

भरी ममता तेरे उर में दया की दृष्टि रखती हो।
करें जो भक्ति से पूजा हिया उनके ही बसती हो।
चरण पूजे जो नित तेरे सुखी हो नित विचरता है।4
हे वीणावादिनी तुझको नमन संसार करता है...

प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, 11 अप्रैल 2020