बस यूँ ही = प्रवीण त्रिपाठी http://utkarshexpress.com/2020/05/29/%e0%a4%ac%e0%a4%b8-%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%81-%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%a3-%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a0%e0%a5%80/
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Friday, 29 May 2020
Sunday, 24 May 2020
*विधा : दोहा गीत*
*विषय : विरहन की पीर*
*पिया बसे परदेश में, हिय में उपजी पीर।*
*साजन की नित याद में, नयनन बहता नीर।*
राधा सी बन बाँवरी, भटकूँ वन दिन-रैन।
कहीं नहीं मन अब लगे, हृदय न पाये चैन।
अपलक राह निहार कर, थकतीं आंखें रोज।
मुख सीँ कर बैठी रहूँ, नहीं निकलते बैन।
चिट्ठी तक आती नहीं, ह्रदय न पावे धीर।
*पिया बसे परदेश में, हिय में उपजी पीर।1*
जिन राहों से तुम गये, देखूँ नित उस ओर।
भटकूँ बन पागल पथिक, चले न दिल पर जोर।
अंतहीन विरहाग्नि में, झुलस रहीं हूँ नित्य।,
हृदय दग्ध अब हो रहा, पीड़ा मन में घोर।
लहरों को बस गिन रही,बैठी नदिया तीर।
*पिया बसे परदेश में, हिय में उपजी पीर।।2*
*साजन की नित याद में, नयनन बहता नीर।*
खटका हो जब द्वार पर, रुक जाती है साँस।
द्वारे पर प्रियतम न हों, चुभती दिल में फाँस।
साँसों की सरगम सधे, यदि लौटे निज गेह।
दरवाजे यदि अन्य हो, लगती मन को डाँस।
वापस अब आओ पिया, व्याकुल हृदय शरीर।
*पिया बसे परदेश में, हिय में उपजी पीर।3*
*वापस आयेंगे सजन, मिट जायेगी पीर।*
*बालम के सानिध्य में, नहीं बहेगा नीर।।*
*प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, 24 मई 2020*
*विषय : विरहन की पीर*
*पिया बसे परदेश में, हिय में उपजी पीर।*
*साजन की नित याद में, नयनन बहता नीर।*
राधा सी बन बाँवरी, भटकूँ वन दिन-रैन।
कहीं नहीं मन अब लगे, हृदय न पाये चैन।
अपलक राह निहार कर, थकतीं आंखें रोज।
मुख सीँ कर बैठी रहूँ, नहीं निकलते बैन।
चिट्ठी तक आती नहीं, ह्रदय न पावे धीर।
*पिया बसे परदेश में, हिय में उपजी पीर।1*
जिन राहों से तुम गये, देखूँ नित उस ओर।
भटकूँ बन पागल पथिक, चले न दिल पर जोर।
अंतहीन विरहाग्नि में, झुलस रहीं हूँ नित्य।,
हृदय दग्ध अब हो रहा, पीड़ा मन में घोर।
लहरों को बस गिन रही,बैठी नदिया तीर।
*पिया बसे परदेश में, हिय में उपजी पीर।।2*
*साजन की नित याद में, नयनन बहता नीर।*
खटका हो जब द्वार पर, रुक जाती है साँस।
द्वारे पर प्रियतम न हों, चुभती दिल में फाँस।
साँसों की सरगम सधे, यदि लौटे निज गेह।
दरवाजे यदि अन्य हो, लगती मन को डाँस।
वापस अब आओ पिया, व्याकुल हृदय शरीर।
*पिया बसे परदेश में, हिय में उपजी पीर।3*
*वापस आयेंगे सजन, मिट जायेगी पीर।*
*बालम के सानिध्य में, नहीं बहेगा नीर।।*
*प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, 24 मई 2020*
*महाराणा प्रताप की जयन्ती पर एक रचना*
हमें याद आयी कहानी पुरानी।
सुनी हमने थी ये किसी की जुबानी।
थे चित्तौड़गढ़ के महाराज राणा।
वतन पर मिटे बन गये इक निशानी।
नहीं सर झुकाया न थी हार मानी
बिताई उन्होंने वनों में जवानी।
नहीं आ सकी आंच उनके वतन पर।
फ़क़त घास रोटी पिया सिर्फ पानी।
लिये हाथ भाला न था कोइ सानी।
लहू बैरियों का बहाने की' ठानी।
कभी छूट जिंदा न दुश्मन था पाया।
विजेता बना रच गया इक कहानी।
पवन सा उड़े अश्व उनका ज़हाँ में।
इशारा समझ बदले अपनी रवानी।
दिखा दृढ़ता अपनी लड़े दुश्मनों से।
निराशा मिली औ पड़ी मुँह की' खानी।
थी राणा की' सुन लो गज़ब की कहानी
वतन पर मिटे बन गये इक निशानी।
जिये वह वतन पर मरे भी वतन पर।
बने देश गौरव नहीं कोई' सानी।
*प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, 09 मई 2020*
हमें याद आयी कहानी पुरानी।
सुनी हमने थी ये किसी की जुबानी।
थे चित्तौड़गढ़ के महाराज राणा।
वतन पर मिटे बन गये इक निशानी।
नहीं सर झुकाया न थी हार मानी
बिताई उन्होंने वनों में जवानी।
नहीं आ सकी आंच उनके वतन पर।
फ़क़त घास रोटी पिया सिर्फ पानी।
लिये हाथ भाला न था कोइ सानी।
लहू बैरियों का बहाने की' ठानी।
कभी छूट जिंदा न दुश्मन था पाया।
विजेता बना रच गया इक कहानी।
पवन सा उड़े अश्व उनका ज़हाँ में।
इशारा समझ बदले अपनी रवानी।
दिखा दृढ़ता अपनी लड़े दुश्मनों से।
निराशा मिली औ पड़ी मुँह की' खानी।
थी राणा की' सुन लो गज़ब की कहानी
वतन पर मिटे बन गये इक निशानी।
जिये वह वतन पर मरे भी वतन पर।
बने देश गौरव नहीं कोई' सानी।
*प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, 09 मई 2020*
*"प्रकाशनार्थ : कोरोना संस्मरण"*
विषय: जिजीविषा की परीक्षा
एक अदृश्य विषाणु कॅरोना' पड़ा सगरे जग पे अति भारी।
लील रहा हर रोज अनेक चपेट में' आ मरते नर-नारी।
निश्चय आज करें मन में बस जीत बने इक लक्ष्य हमारा।
हिम्मत से यह यद्ध लड़ें अरु खत्म करें मिल के महमारी।1
संयम से सब लोग रहें बिन हाथ धुले घर में मत आयें।
मेल मिलाप नहीं करके मिलने पे' कभी मत हाथ मिलायें।
आपस में न सटें कुछ रोज रखें बस एक सुरक्षित दूरी।
उत्सव बंद करें सब लोग न धर्म के नाम पे' भीड़ जुटायें।2
युद्ध कॅरोना से नित्य करे जग, आन विपत्ति पड़ी अब भारी।
ठप्प हुआ सारा जनजीवन, कष्ट सहे जनता अब सारी।
जूझ रहे सर्व चिकित्सक, दाँव लगा निज जीवन सारे।
तोड़ नहीं मिल पाया' अभी तक, खोज निरंतर है अब जारी।3
आज सलाम करें उनको खतरा जनता हित रोज उठाते।
आफत से सब जूझ रहे अब डॉक्टर सेवक जान गँवाते।
बंद भले घर भीतर लोग वहीं बल शस्त्र करें नित ड्यूटी।
जान लगाय समाज व देश के रक्षक बन निज फर्ज़ निभाते।4
प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा
विषय: जिजीविषा की परीक्षा
एक अदृश्य विषाणु कॅरोना' पड़ा सगरे जग पे अति भारी।
लील रहा हर रोज अनेक चपेट में' आ मरते नर-नारी।
निश्चय आज करें मन में बस जीत बने इक लक्ष्य हमारा।
हिम्मत से यह यद्ध लड़ें अरु खत्म करें मिल के महमारी।1
संयम से सब लोग रहें बिन हाथ धुले घर में मत आयें।
मेल मिलाप नहीं करके मिलने पे' कभी मत हाथ मिलायें।
आपस में न सटें कुछ रोज रखें बस एक सुरक्षित दूरी।
उत्सव बंद करें सब लोग न धर्म के नाम पे' भीड़ जुटायें।2
युद्ध कॅरोना से नित्य करे जग, आन विपत्ति पड़ी अब भारी।
ठप्प हुआ सारा जनजीवन, कष्ट सहे जनता अब सारी।
जूझ रहे सर्व चिकित्सक, दाँव लगा निज जीवन सारे।
तोड़ नहीं मिल पाया' अभी तक, खोज निरंतर है अब जारी।3
आज सलाम करें उनको खतरा जनता हित रोज उठाते।
आफत से सब जूझ रहे अब डॉक्टर सेवक जान गँवाते।
बंद भले घर भीतर लोग वहीं बल शस्त्र करें नित ड्यूटी।
जान लगाय समाज व देश के रक्षक बन निज फर्ज़ निभाते।4
प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा
*शीर्षक : प्रकृति संतुलन*
*आधार छन्द - वाचिक स्रग्विणी*
*मापनी - 212 212 212 212*
*लगावली - गालगा गालगा गालगा गालगा*
*अपदान्त , समान्त- अन*
ग्रीष्म का हो गया है पुनः आगमन।
देखते देखते बढ़ गई है तपन।1
ताप इतना बढ़ा झेल पाते नहीं।
छाँव शीतल मिले कर प्रकृति को नमन।2
छाँह को खोजते है परिंदे पथिक।
जानवर बेकली से निहारें गगन।3
बूँद जल की हुईं लुप्त हर ओर से।
प्यास से है परेशान पाखी चमन।4
चोंच खोले विहग हाँफते हर दिशा।
बाँध कर हम परिंडे करें कुछ जतन।5
छाँह पग-पग मिले कल धरा पर पुनः।
पीढ़ियों के लिये वृक्ष रोपें सघन।6
गर्मियों में नहीं कोई' प्यासा रहे।
ताल-नदियाँ भरें मेघ बरसें गहन।7
हैं ज़रूरी बहुत सर्दियाँ गर्मियाँ।
मौसमों में रहे सर्वदा संतुलन।8
हो प्रगति हर दिशा ध्यान यह भी रखें।
हो प्रदूषण रहित स्वच्छ वातावरण।9
*प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, 17 मई 2020*
*आधार छन्द - वाचिक स्रग्विणी*
*मापनी - 212 212 212 212*
*लगावली - गालगा गालगा गालगा गालगा*
*अपदान्त , समान्त- अन*
ग्रीष्म का हो गया है पुनः आगमन।
देखते देखते बढ़ गई है तपन।1
ताप इतना बढ़ा झेल पाते नहीं।
छाँव शीतल मिले कर प्रकृति को नमन।2
छाँह को खोजते है परिंदे पथिक।
जानवर बेकली से निहारें गगन।3
बूँद जल की हुईं लुप्त हर ओर से।
प्यास से है परेशान पाखी चमन।4
चोंच खोले विहग हाँफते हर दिशा।
बाँध कर हम परिंडे करें कुछ जतन।5
छाँह पग-पग मिले कल धरा पर पुनः।
पीढ़ियों के लिये वृक्ष रोपें सघन।6
गर्मियों में नहीं कोई' प्यासा रहे।
ताल-नदियाँ भरें मेघ बरसें गहन।7
हैं ज़रूरी बहुत सर्दियाँ गर्मियाँ।
मौसमों में रहे सर्वदा संतुलन।8
हो प्रगति हर दिशा ध्यान यह भी रखें।
हो प्रदूषण रहित स्वच्छ वातावरण।9
*प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, 17 मई 2020*
*तोटक छंद*
*विधान--*
*👉 यह सम वार्णिक छंद है*
*👉तोटक छंद में चार चरण होते हैं |* *प्रत्येक चरण में चार सगण (112)सहित कुल 12 वर्ण होते हैं।*
*👉 दो दो चरण समतुकान्त*
*👉पूरे छंद में केवल "सगण ✖ 4"*
*अर्थात लघु-लघु-गुरू 112 ✖ 4 का विधान क्रम रहता है*
*शीर्षक : भाव-विभाव"*
सुन लो मन की कुछ बात सखे।
वह नेह करो सब को न लखे।
मनभावन प्रीत पगी तन में।
इक हूक उठी अपने मन में।1
मुसकान छिपा कर बैठ गये।
मन में उभरे कुछ ख्वाब नये।
बिसरा न सके बतला न सके।
अरु नेह सुधा रस पी न सके।2
बदरा बरसे बिन लौट गये।
करने फिरसे अब यत्न नये।
बुझ जाय तृषा जिससे हिय की।
दब जाय व्यथा उससे जिय की।3
बन चातक सा एक साधक जो।
बन वारिद का अराधक वो।
जल अन्य पपीह नहीं चखता
बस स्वाति नक्षत्र रहे तकता।4
नभ से पहली जब बूँद गिरे।
चख के उसके फिर भाग फिरे।
मधुमास बसा तब से मन में।
इक जोश जगा उसके तन में।4
*प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, 21 मई 2020*
*विधान--*
*👉 यह सम वार्णिक छंद है*
*👉तोटक छंद में चार चरण होते हैं |* *प्रत्येक चरण में चार सगण (112)सहित कुल 12 वर्ण होते हैं।*
*👉 दो दो चरण समतुकान्त*
*👉पूरे छंद में केवल "सगण ✖ 4"*
*अर्थात लघु-लघु-गुरू 112 ✖ 4 का विधान क्रम रहता है*
*शीर्षक : भाव-विभाव"*
सुन लो मन की कुछ बात सखे।
वह नेह करो सब को न लखे।
मनभावन प्रीत पगी तन में।
इक हूक उठी अपने मन में।1
मुसकान छिपा कर बैठ गये।
मन में उभरे कुछ ख्वाब नये।
बिसरा न सके बतला न सके।
अरु नेह सुधा रस पी न सके।2
बदरा बरसे बिन लौट गये।
करने फिरसे अब यत्न नये।
बुझ जाय तृषा जिससे हिय की।
दब जाय व्यथा उससे जिय की।3
बन चातक सा एक साधक जो।
बन वारिद का अराधक वो।
जल अन्य पपीह नहीं चखता
बस स्वाति नक्षत्र रहे तकता।4
नभ से पहली जब बूँद गिरे।
चख के उसके फिर भाग फिरे।
मधुमास बसा तब से मन में।
इक जोश जगा उसके तन में।4
*प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, 21 मई 2020*
*शीर्षक : अविजित सेनानी*
*विधा : गीतिका छंद पर आधारित गीतिका*
देश का सैनिक हमेशा युद्ध को तैयार है।
चुप नहीं वह बैठता सुन कर कभी ललकार है।1
जब खड़ा हो सरहदों पर वह न झपकाये पलक।
नित अचल अविचल सजग निष्फल करे रिपु वार है।2
नित नयी दुष्वरियाँ जिनकी न कोई कल्पना।
हर परिस्थिति में सदा अरि का करे संहार है।3
देश की रक्षा करे सैनिक सभी सुख त्याग कर।
नववधू के नूपुरों की भूलता झनकार है।4
देश के हर नागरिक की वह समझता वेदना।
प्राकृतिक विपदाओं' में बनता वो' तारणहार है।5
*आपदा में दे सहारा बन के तारणहार है।??*
वह नहीं कुछ माँगता सेवा करे निःस्वार्थ बन।
बस मिले सम्मान जो सबसे बड़ा उपहार है।6
मूल्य कोई आँक सकता क्या कभी बलिदान का?
वह तिरंगे पर निछावर कर रहा संसार है।7
छोड़ पीछे सर्व रिश्ते प्रीति भारत से करे।
राष्ट्र वादी व्यक्त करता कोटिशः आभार है।8
मूल्य पहचानें शहीदों के बहाये रक्त का।
व्यर्थ मत बलिदान हो यह वक्त की दरकार है।9
*प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, 22 मई 2020*
*विधा : गीतिका छंद पर आधारित गीतिका*
देश का सैनिक हमेशा युद्ध को तैयार है।
चुप नहीं वह बैठता सुन कर कभी ललकार है।1
जब खड़ा हो सरहदों पर वह न झपकाये पलक।
नित अचल अविचल सजग निष्फल करे रिपु वार है।2
नित नयी दुष्वरियाँ जिनकी न कोई कल्पना।
हर परिस्थिति में सदा अरि का करे संहार है।3
देश की रक्षा करे सैनिक सभी सुख त्याग कर।
नववधू के नूपुरों की भूलता झनकार है।4
देश के हर नागरिक की वह समझता वेदना।
प्राकृतिक विपदाओं' में बनता वो' तारणहार है।5
*आपदा में दे सहारा बन के तारणहार है।??*
वह नहीं कुछ माँगता सेवा करे निःस्वार्थ बन।
बस मिले सम्मान जो सबसे बड़ा उपहार है।6
मूल्य कोई आँक सकता क्या कभी बलिदान का?
वह तिरंगे पर निछावर कर रहा संसार है।7
छोड़ पीछे सर्व रिश्ते प्रीति भारत से करे।
राष्ट्र वादी व्यक्त करता कोटिशः आभार है।8
मूल्य पहचानें शहीदों के बहाये रक्त का।
व्यर्थ मत बलिदान हो यह वक्त की दरकार है।9
*प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, 22 मई 2020*
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