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Sunday, 24 May 2020

*विधा  : दोहा गीत*
*विषय : विरहन की पीर*

*पिया बसे परदेश में, हिय में उपजी पीर।*
*साजन की नित याद में, नयनन बहता नीर।*

राधा सी बन बाँवरी, भटकूँ वन दिन-रैन।
कहीं नहीं मन अब लगे, हृदय न पाये चैन।
अपलक राह निहार कर, थकतीं आंखें रोज।
मुख सीँ कर बैठी रहूँ, नहीं निकलते बैन।
चिट्ठी तक आती नहीं, ह्रदय न पावे धीर।
*पिया बसे परदेश में, हिय में उपजी पीर।1*

जिन राहों से तुम गये, देखूँ नित उस ओर।
भटकूँ बन पागल पथिक, चले न दिल पर जोर।
अंतहीन विरहाग्नि में, झुलस रहीं हूँ नित्य।,
हृदय दग्ध अब हो रहा, पीड़ा मन में घोर।
लहरों को बस गिन रही,बैठी नदिया तीर।
*पिया बसे परदेश में, हिय में उपजी पीर।।2*
*साजन की नित याद में, नयनन बहता नीर।*

खटका हो जब द्वार पर, रुक जाती है साँस।
द्वारे पर प्रियतम न हों, चुभती दिल में फाँस।
साँसों की सरगम सधे, यदि लौटे निज गेह।
दरवाजे यदि अन्य हो, लगती मन को डाँस।
वापस अब आओ पिया, व्याकुल हृदय शरीर।
*पिया बसे परदेश में, हिय में उपजी पीर।3*

*वापस आयेंगे सजन, मिट जायेगी पीर।*
*बालम के सानिध्य में, नहीं बहेगा नीर।।*

*प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, 24 मई 2020*

2 comments:

  1. वाह विरहन की पीर शानदार अभिव्यक्ति

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  2. वाह वाह अति सुंदर

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