Followers

Sunday, 24 May 2020

*"प्रकाशनार्थ : कोरोना संस्मरण"*

विषय: जिजीविषा की परीक्षा

एक अदृश्य विषाणु कॅरोना' पड़ा सगरे जग पे अति भारी।
लील रहा हर रोज अनेक चपेट में' आ मरते नर-नारी।
निश्चय आज करें मन में बस जीत बने इक लक्ष्य हमारा।
हिम्मत से यह यद्ध लड़ें अरु खत्म करें मिल के महमारी।1

संयम से सब लोग रहें बिन हाथ धुले घर में मत आयें।
मेल मिलाप नहीं करके मिलने पे' कभी मत हाथ मिलायें।
आपस में न सटें कुछ रोज रखें बस एक सुरक्षित दूरी।
उत्सव बंद करें सब लोग न धर्म के नाम पे' भीड़ जुटायें।2

युद्ध कॅरोना से नित्य करे जग, आन विपत्ति पड़ी अब भारी।
ठप्प हुआ सारा जनजीवन, कष्ट सहे जनता अब सारी।
जूझ रहे सर्व चिकित्सक, दाँव लगा निज जीवन सारे।
तोड़ नहीं मिल पाया' अभी तक, खोज निरंतर है अब जारी।3

आज सलाम करें उनको खतरा जनता हित रोज उठाते।
आफत से सब जूझ रहे अब डॉक्टर सेवक जान गँवाते।
बंद भले घर भीतर लोग वहीं बल शस्त्र करें नित ड्यूटी।
जान लगाय समाज व देश के रक्षक बन निज फर्ज़ निभाते।4

प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा

No comments:

Post a Comment