Followers

Sunday, 24 May 2020

*शीर्षक : प्रकृति संतुलन*

*आधार छन्द - वाचिक स्रग्विणी*

*मापनी    - 212  212  212  212*
*लगावली - गालगा गालगा गालगा गालगा*
*अपदान्त , समान्त- अन*

ग्रीष्म का हो गया है पुनः आगमन।
देखते देखते बढ़ गई है तपन।1

ताप इतना बढ़ा झेल पाते नहीं।
छाँव शीतल मिले कर प्रकृति को नमन।2

छाँह को खोजते है परिंदे पथिक।
जानवर बेकली से निहारें गगन।3

बूँद जल की हुईं लुप्त हर ओर से।
प्यास से है परेशान पाखी चमन।4

चोंच खोले विहग हाँफते हर दिशा।
बाँध कर हम परिंडे करें कुछ जतन।5

छाँह पग-पग मिले कल धरा पर पुनः।
पीढ़ियों के लिये वृक्ष रोपें सघन।6

गर्मियों में नहीं कोई' प्यासा रहे।
ताल-नदियाँ भरें मेघ बरसें गहन।7

हैं ज़रूरी बहुत सर्दियाँ गर्मियाँ।
मौसमों में रहे सर्वदा संतुलन।8

हो प्रगति हर दिशा ध्यान यह भी रखें।
हो प्रदूषण रहित स्वच्छ वातावरण।9

*प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, 17 मई 2020*

No comments:

Post a Comment