*बच्चों में अच्छे संस्कार कैसे डालें*
अंग्रेजी में एक कहावत है "चैरिटी बेगिन्स ऐट होम(Charity Begins at Home)". यह कहावत "बच्चों में अच्छे संस्कार कैसे डालें" विषय पर बहुत सटीक बैठती है। हम यह भी जानते हैं कि सीखना एक सतत प्रक्रिया है जो कि जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत चलती रहती हैं। यदि पौराणिक गाथाओं पर दृष्टिपात करें तो यह पाते हैं कि सीखने की प्रक्रिया गर्भावस्था से ही आरंभ हो जाती है और इसका उदाहरण महाभारत काल में अभिमन्यु के रूप में मिलता है जिन्होंने गर्भ में रह कर ही चक्रव्यूह भेदन की युक्ति सीख ली थी। वर्तमान वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात करें तो मनोवैज्ञानिक भी कहते हैं कि माता के मनोभावों का असर गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है इसी वजह से गर्भवती माताओं को सकारात्मक रहने की सलाह दी जाती है।
जन्म के उपरांत शिशु या बच्चा मिट्टी के लोंदे के समान होता है जिसे समाज के विभिन्न अवयवों द्वारा संस्कार के साँचे में ढाला जाता है जिनमें मुख्य निम्नवत हैं:-
माता-पिता
भाई-बहन
परिवार के अन्य सदस्य या बड़े-बूढ़े
अध्यापक
मित्रगण
सहयोगी
पुस्तकें
दृश्य-श्रव्य माध्यम
माता-पिता बच्चों में संस्कार के बीज बोने तथा उनको पोषित करते में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जहां माँ का साथ संतति से गर्भावस्था से ही जुड़ जाता है वहीं पिता उनको एक वट वृक्ष की तरह छाँह प्रदान करता है जिसके तले उनका व्यक्तित्व विकसित होता है। पौराणिक एवं ऐतिहासिक काल से ही माँ अपने आचरण, अपनी लोरियों तथा कहानियों के माध्यम से व समय-समय पर मार्गदर्शन देकर चरित्र निर्माण व संस्कार भरने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। गर्भनाल से जुड़ा नाता बच्चों को माँ के निकट लाता है जिसके कारण वो अपने मन की बातें बेझिझक साझा कर पाते हैं।
वहीं पालक की भूमिका में पिता का योगदान कमतर नहीं होता। पिता की उँगली पकड़ कर संतति चलना सीखती है, पिता का धीर-गम्भीर व अनुकरणीय व्यक्तित्व रोल मॉडल का काम करता है। बच्चों में सहनशीलता, धैर्य, साहस व परिस्थितियों का मुकाबला करने की क्षमता व कला पिता से ही आती है। नियंत्रित संवेदनाओं के साथ विषम स्थिति का सामना करने का गुण पिता अपने बच्चों में भरता है। कहते हैं जो बच्चे बड़ों में देखते हैं उसी का अनुकरण करते हैं अतः माता-पिता का आचरण उत्तम और अनुकरणीय होना चाहिये।
इसी प्रकार भाई-बहन तथा मित्रगण भी चरित्र निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं। आपसी सामंजस्य, सहभागिता, सहनशीलता तथा साझा करने की प्रवृत्ति और त्याग की भावना का रोपण इन्हीं की संगति में होता है। आपसी लड़ाई-झगड़े को तुरत भुला कर फिर साथ-साथ आगे बढ़ने का संस्कार इन सबके मध्य रहकर ही विकसित होता है। समूह में रहकर अपने अस्तित्व को सामूहिकता में समायोजित करने की क्षमता का विकास इन्हीं के मध्य होता है। इसी प्रकार विभिन्न घरेलू खेलों में टीम भावना और लीडरशिप का गुण भी इसी काल में विकसित होता है।
गुरु भगवन हैं एक समाना उक्ति गुरु या अध्यापक की महत्ता को दर्शाता है। माँ-बाप से मिली औपचारिक शिक्षा को आगे बढ़ाते हुए गुरु या अध्यापक बच्चों के चरित्र निर्माण की प्रक्रिया को नया आयाम प्रदान करते हैं। शिक्षक ही ज्ञान प्रदान करने के साथ-साथ व्यावहारिकता और सामंजस्य और अनुशासन का पाठ भी पढ़ाते हैं। अच्छे गुरु अपने सार्थक योगदान के द्वारा छात्रों के भविष्य निर्माण करते हैं। श्री राम के गुरु वशिष्ठ मुनि व महर्षि विश्वमित्र तथा श्रीकृष्ण के गुरु संदीपनि ऋषि के योगदान को भला कौन विस्मृत कर सकता है। जिनके द्वारा दिये गए ज्ञान व शिक्षा के बोल पर श्री राम व श्री कृष्ण अपने अभीष्ठ लक्ष्य को प्राप्त करने सफल रहे।
घर के बड़े-बूढ़ों या अग्रजों से विभिन्न अवसरों पर कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। जहाँ चाचा-चाची, ताऊ-ताई, दादा-दादी, नाना-नानी बच्चों में लाड़-दुलार बरसाने के साथ-साथ गलती होने और डाँट और समझाइश द्वारा सही गलत पहचान करवाते हैं। दूसरी ओर दादा-दादी, नाना-नानी किस्से-कहानियों के माध्यम से न सिर्फ उनका मनोरंजन व ज्ञानवर्धन करते हैं अपितु परोक्ष रूप से संस्कारों के बीज भी रोपित करते हैं जो जीवनपर्यंत साथ रहते हैं। विश्व में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसे बचपन में सुनी कहानी या उनसे मिली सीख याद न हो।
बच्चे शिक्षा समाप्त कर के कर्मक्षेत्र में प्रवेश करते हैं जहाँ उन्हें विभिन्न विषम परस्थितयों का सामना करना पड़ता है जैसे कार्य क्षेत्र सम्बन्धी तनाव, आपसी प्रतिस्पर्धा व व्यावसायिक वैमनस्य। इन सबसे निबटने में सहयोगी विशेषतौर पर वरिष्ठ सहयोगी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी तरह विभिन्न व्यावसायिक संगठन से जुड़ के समन्वय के साथ अपना कार्य करने सक्षम हो सकें।
हर उम्र के व्यक्ति का सबसे प्रिय और सच्चा साथी किताबें होती हैं। विशेषतया बच्चों को तो अति प्रिय होती हैं। जिनमें पौराणिक एवं ऐतिहासिक पात्रों को लेकर चित्र कथाएं या कॉमिक बुक्स प्रमुख हैं। इन पुस्तकों में वर्णित पात्रों तथा घटनाओं के माध्यम से चरित्र निर्माण एवं संस्कारों का रोपण किया जाता है। अगर अपने बचपन को याद करें तो उस समय पढ़ी हुई अमर चित्रकथा में वर्णित सत्यवादी हरिश्चंद्र, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, स्वामी विवेकानंद , सुभाषचंद्र बोस आदि महापुरुषों के चरित्रों के बारे में पढ़कर बाल मन पर गहरा असर देखा होगा। वो चरित्र, उनसे जुड़ी घटनाएं आज भी मन में रची बसी हैं जो गाहे-बगाहे आज भी या तो प्रेरणा देती हैं या गलत काम करने से पहले सचेत करती हैं।
इसी प्रकार दृश्य-श्रव्य माध्यम भी मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालते हैं। यह एक दोधारी तलवार है जिसका सार्थक या घातक प्रभाव पड़ सकता है। वर्तमान समय में इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स खासकर स्मार्टफोन और लैपटॉप आदि की पहुँच सर्वव्यापक को चुकी है अतः इस पर गौर करना होगा और सावधानी रखनी होगी कि बच्चे कब और क्या देख-सुन रहे हैं। अन्यथा लाभ होने के बजाय हानि भी हो सकती है।
सम्प्रति हम यह कह सकते हैं कि बालमन कोमल और इम्प्रेशनेबल(शीघ्र ग्रहण करने वाला) होता है। एक समग्र व्यक्तित्व की नींव बचपन में ही पड़ती है। वह नींव किस प्रकार तथा किस सामग्री से बनी है इसी पर इमारत की मजबूती और स्थायित्व निर्भर करता है। बच्चों के सर्वांगीण विकास में संस्कार के बीज बोना और उनका समयानुसार पोषण करना, पारिवारिक व सामाजिक जिम्मेदारी है जिसमें समाज के सभी घटकों का बहुमूल्य योगदान होता है
कर्नल प्रवीण शंकर त्रिपाठी
नोएडा
Twitter ID @tripathi_ps
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